नारी का देह नहीं है मदिरा...
नारी का देह नहीं है मदिरा,जो नर वासना रस का पान करे.
वरदान है ईस्वर का कोई वास्तु नहीं जिसका नर भोग करे.
मर्म समझे जो नर नारी का,नारी सदा उसका कल्याण करे .
मान करे जो नर नारी का,जीवन भर अमरत्व रस पान करे .
नरभक्छी है वो जो रक्त-पिपासु बन नर चूसे नारी को
ज्ञात होता नारी को क्यों पैदा करती ऐसे नरभक्छी को.
लहू जिसका जीव-देह में जीवन बनके बहता,वो जननी है नारी.
सब तत्त्व पुरषार्थ जीवन का दिया जिसने वो जननी है नारी .
पशुवत निर्मम नारी के जीव-देह को नोचता जो नर.
मानव तुल्य नहीं नीच-अधम-अत्याचारी है वो नर.
नारी से ही जीवन,जीवन का आधार आहो.
विटम-मूल उखड़े जो नर उसे खल कहो.
हे नारी!तुम एक सक्ति हो स्वयं में इसका बोध करो.
बीरांगना बन चपल सामना इन दुष्टो का संघार करो.
हे नारी! विनय-याचना नर से क्यों करती हो.
अधिकार तुम्हरे है स्वयं क्यों नहीं कहती हो.
भीरु बन अत्याचार क्यों सहती हो.
एकत्व होके क्यों नहीं लड़ती हो .
सदियों से घर की चार दीवारी में कैद घुटती हो.
बराबर की अधिकारी हो,क्या तुम ये कहती कहो?.
नर हो के भी कहता हूँ,समाज की इन बेड़ियों को तोड़ आगे बढ़ो.
नारी सक्ति का अहसास कराओ,छूलो आसमान की बुलंदियों को.
निर्मल चरित्र है,नारी का श्रृंगार सदैव इसपर अभिमान करो.
यही है तुम्हारी अनमोल धरोहर सत्य से इसे स्वीकार करो.
नारी हो!देवी हो!इसका सदैव ख्याल रखो.
मर्यादा में रह कर ही सब कर्म-विधान करो.
इसी संस्कार को साथ लेकर आगे बड़ो .
स्वयं का मान सृष्टि का कल्याण करो .
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